आज़ादी के बाद भारत सरकार ने देश के विकास के लिए कई अहम कदम उठाए. इनमें से एक महत्वपूर्ण कदम था सरकारी कर्मचारियों के लिए उचित वेतन व्यवस्था का निर्माण करना. इस दिशा में पहला वेतन आयोग 1946 में बनाया गया था. इसके बाद हर दस साल में वेतन आयोग बनाकर सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों की समीक्षा की जाती थी.

चौथा वेतन आयोग (Fourth Pay Commission) जून 1983 में बनाया गया था. इस आयोग ने चार सालों के दौरान तीन चरणों में अपनी रिपोर्ट दी. आयोग के अध्यक्ष पीएन सिंघल थे. आइए, इस लेख में चौथे वेतन आयोग और उसकी सिफारिशों के बारे में विस्तार से जानते हैं.

चौथा वेतन आयोग: सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बदलाव का दौर Fourth Pay Commission: A period of change in the salary of government employees

चौथे वेतन आयोग का गठन

जैसा कि हमने बताया, चौथा वेतन आयोग जून 1983 में बनाया गया था. उस समय देश में महंगाई बढ़ रही थी और सरकारी कर्मचारियों का वेतन उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा था. इसलिए सरकार ने एक नया वेतन आयोग बनाने का फैसला किया ताकि वेतन और भत्तों की समीक्षा की जा सके.

आयोग के सामने चुनौतियां

चौथे वेतन आयोग के सामने कई चुनौतियां थीं:

  • महंगाई को नियंत्रित करना: उस समय भारत में महंगाई तेजी से बढ़ रही थी. आयोग को यह सुनिश्चित करना था कि वेतन वृद्धि से महंगाई और भी ना बढ़े.
  • वेतन असमानता कम करना: सरकारी विभागों और पदों के हिसाब से कर्मचारियों के वेतन में काफी अंतर था. आयोग को ऐसी सिफारिशें करनी थीं जिससे यह असमानता कम हो सके.
  • सरकारी खर्च का ध्यान रखना: वेतन बढ़ाने से सरकारी खर्च में भी इजाफा होता है. आयोग को ऐसी सिफारिशें करनी थीं जिनसे सरकारी खर्च पर बहुत अधिक बोझ ना पड़े.

चौथे वेतन आयोग की सिफारिशें

चौथे वेतन आयोग ने 1987 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं, जिनका सीधा असर सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों पर पड़ा.

  • वेतन वृद्धि: आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन वृद्धि की सिफारिश की. इस वृद्धि से अधिकतर कर्मचारियों के वेतन में लगभग 50% से 100% तक का इजाफा हुआ.
  • महंगाई भत्ता (DA) में वृद्धि: महंगाई से राहत दिलाने के लिए आयोग ने महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) में भी वृद्धि की सिफारिश की. यह भत्ता मूल वेतन के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में दिया जाता है.
  • अन्य भत्तों में वृद्धि: वेतन और DA के अलावा, आयोग ने कई अन्य भत्तों को भी बढ़ाने की सिफारिश की. इनमें शामिल थे –
    • मकान किराया भत्ता (House Rent Allowance – HRA)
    • यात्रा भत्ता (Travelling Allowance – TA)
    • बच्चों के शिक्षा भत्ता (Children’s Education Allowance)
    • चिकित्सा भत्ता (Medical Allowance)
  • पेंशन सुधार: चौथे वेतन आयोग ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था में भी सुधार की सिफारिश की.

सिफारिशों का प्रभाव

चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों को सरकार ने लागू किया. इन सिफारिशों का सरकारी कर्मचारियों के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा:

  • आर्थिक स्थिति में सुधार: वेतन और भत्तों में वृद्धि से सरकारी कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई. उनका जीवनयापन का स्तर ऊंचा आया.
  • मनोबल बढ़ा: बेहतर वेतन पैकेज से सरकारी कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा. इससे सरकारी विभागों में कार्यकुशलता में भी सुधार हुआ.
  • सरकारी खर्च में वृद्धि: हालाँकि, वेतन वृद्धि और अन्य भत्तों में बढ़ोतरी के कारण सरकार के ख़र्च में भी काफी इजाफा हुआ.

विवाद और आलोचना

चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों को लेकर भी कुछ विवाद और आलोचना हुई:

  • वेतन वृद्धि पर्याप्त नहीं: कुछ कर्मचारी संगठनों का मानना था कि वेतन वृद्धि अपेक्षा से कम थी, खासकर निचले स्तर के कर्मचारियों के लिए.
  • महंगाई पर नियंत्रण ना होना: आयोग की सिफारिशों के बाद भी महंगाई कम होने के बजाय और बढ़ गई. इससे कुछ लोगों को फायदा कम हुआ.
  • सरकारी खर्च का बोझ: आलोचकों का कहना था कि वेतन वृद्धि से सरकारी खर्च बहुत बढ़ गया, जिससे सरकार के विकास कार्यों पर असर पड़ा.

चौथा वेतन आयोग भारतीय अर्थव्यवस्था के एक ऐसे दौर में बना था, जब महंगाई तेजी से बढ़ रही थी. आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में वृद्धि की सिफारिश जरूर की, लेकिन महंगाई को नियंत्रित करने में नाकामयाबी भी रही. हालाँकि, इस आयोग की सिफारिशों से सरकारी कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और उनका जीवनयापन का स्तर ऊंचा आया.

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